गांठ

 



"पापाताईजी को शायद कैंसर है!" बेटा धड़धड़ाते हुए कमरे में घुसा.

"कहां से चले  रहे हो रिपोर्टर बने हुएपता भी है क्या बोल रहे हो..?" मैंने महसूस किया कि दिसंबर की ठंड में भी पसीना मेरीकनपटी भिगो रहा था.

"डाॅक्टर अंकल हैं नासंतोष अंकल… मिले थे अभी पार्क‌ मेंबता रहे थे  ताईजी के गले मेंयहां पर एक गांठ है छोटी-सी… कोई टेस्टकिया है चार दिन पहलेआज रिपोर्ट आएगी."  बेटे की आंखें भर आई थींमैं अपराधबोध से भरा हुआ शून्य में ताक रहा था.


बच्चों के छोटे-छोटे झगड़ेबड़ों के बीच वैमनस्यता पैदा करते हुए एक परिवार को दो भागोंदो घरों में बांट

चुके थेवो भी इस तरह से कि एक ही मकान में रहते हुएआज भाभी के बारे में दूसरों से ख़बर मिल रही हैसंतोष और मैं हमजोली हैंउसने भी मुझे नहीं बताया… कांपते कदमों से कब हम पति-पत्नी सीढ़ी चढ़ गएपता ही नहीं चला.

"अरेख़ुश रहोख़ुश रहो… देखो मधुकौन आया है." मैं और सुमन


चरण-स्पर्श के लिए झुकेतो भइया भावुक होकर हड़बड़ा गएभाभी ने आकर सुमन को गले लगा लिया.


"संतू ने बताया सुबह रोहन को कि आज रिपोर्ट आनेवाली है…" मेरा मन भीगा जा रहा थाजी कर रहा था भइया से लिपट जाऊं.

"ओहअच्छा… वैसे मना किया था संतोष सेकिसी को ना बताएलेकिन पेट का कच्चा है


खैररिपोर्ट तो  गई." भइया ने क़ाग़जों का एक पुलिंदा मेज़ पर से उठाया.


"भगवान की दया से सब ठीक है… कुछ नहीं निकला रिपोर्ट में…"

मेरे दिल से जैसे एक पत्थर हट गयासुमन ना जाने कौन-सा मंत्र बुदबुदाती हुई भाभी को लेकर 'ग्यारह नारियल की मनौतीपूरी करनेनिकल पड़ीमैं भी नीचे


जाने लगा.


"तुम कहां चलेये लोग  जाएं मंदिर सेफिर  नाश्ता करते हैं!" कितने दिनों बाद भइया ने उसी पुराने अधिकार से मुझे टोका!

"संतू के क्लीनिक जा रहे हैं भइयादो घूंसों में डॉक्टरी निकाल देंगेफैमिली डॉक्टर हैतमीज़ से रहे… एक ज़रा-सी गांठ को कैंसर बतादियाहद है!"


"साथ चलेंगे उसको धन्यवाद देने." भइया मेरे बगल में आकर बैठ गए।


"संतू गांठ को समझ नहीं पायावो उसकी ग़लती हैलेकिन ये तो सोचोउसकी इसी नासमझी ने हमारी आपसी गांठ तो सुलझा दी!"


रिश्तों की गांठ सुलझाने के लिए किसी और गांठ का इंतजार क्या करना.... मना लीजिए जो रूठे हैं उनको।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

घर का चौकीदार

सटीक इलाज