तुलसी चौरा




एक बार तुलसीदास जी महाराज को किसी ने बताया की जगन्नाथ जी में तो साक्षात भगवान ही दर्शन देते हैं ।बस फिर क्या था सुनकरतुलसीदास जी महाराज तो बहुत ही प्रसन्न हुए और अपने इष्टदेव का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी को चल दिए।


महिनों की कठिन और थका देने वाली यात्रा के उपरांत जब वह जगन्नाथ पुरी पहुँचे तो मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर प्रसन्नमन सेअंदर प्रविष्ट हुए।जगन्नाथ जी का दर्शन करते ही उन्हें बड़ा धक्का सा लगा वह निराश हो गये और विचार किया कि यह हस्तपादविहीनदेव हमारे जगत में सबसे सुंदर नेत्रों को सुख देने वाले मेरे इष्ट श्री राम नहीं हो सकते।


इस प्रकार दु:खी मन से बाहर निकल कर दूर एक वृक्ष के तले बैठ गये। सोचा कि इतनी दूर आना व्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वालाहस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है ? कदापि नहीं। रात्रि हो गयीथके-माँदेभूखे-प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था। अचानकएक आहट हुई। वे ध्यान से सुनने लगे। अरे बाबा ! तुलसीदास कौन है ? एक बालक हाथों में थाली लिए पुकार रहा था। तुलसीदास जीने सोचा साथ आए लोगों में से शायद किसी ने पुजारियों को बता दिया होगा कि तुलसीदास जी भी दर्शन करने को आए हैंइसलियेउन्होने प्रसाद भेज दिया होगा।


वे उठते हुए बोले - 'हाँ भाई ! मैं ही हूँ तुलसीदास।बालक ने कहा, 'अरे ! आप यहाँ हैंमैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूँ।बालक नेकहा -'लीजिएजगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है।तुलसीदास बोले- 'भैया कृपा करके इसे वापस ले जायें।बालक ने कहाआश्चर्य की बात है, "जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथऔर वह भी स्वयं महाप्रभु ने भेजा और आप अस्वीकार कर रहे हैं। कारण ?


तुलसीदास बोले, 'अरे भाई ! मैं बिना अपने इष्ट को भोग लगाये कुछ ग्रहण नहीं करता। फिर यह जगन्नाथ का जूठा प्रसाद जिसे मैं अपनेइष्ट को समर्पित  कर सकूँयह मेरे किस काम का ?' बालक ने मुस्कराते हुए कहा अरेबाबा ! आपके इष्ट ने ही तो भेजा है।


तुलसीदास बोले - यह हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकता। बालक ने कहा कि फिर आपने अपने श्रीरामचरितमानस में यहकिस रूप का वर्णन किया है -


बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना

आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥


अब तुलसीदास की भाव-भंगिमा देखने लायक थी। नेत्रों में अश्रु-बिन्दुमुख से शब्द नहीं निकल रहे थे। थाल रखकर बालक यह कहकरअदृश्य हो गया कि 'मैं ही तुम्हारा राम हूँ।मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा है। विभीषण नित्य मेरे दर्शन को आता है। कलप्रातः तुम भी आकर दर्शन कर लेना।'


तुलसीदास जी की स्थिति ऐसी की रोमावली रोमांचित थीनेत्रों से अस्त्र अविरल बह रहे थेऔर शरीर की कोई सुध ही नहीं उन्होंने बड़ेही प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया। प्रातः मंदिर में जब तुलसीदास जी महाराज दर्शन करने के लिए गए तब उन्हें जगन्नाथबलभद्र और सुभद्राके स्थान पर श्री रामलक्ष्मण एवं जानकी के भव्य दर्शन हुए। भगवान ने भक्त की इच्छा पूरी की।


जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने रात्रि व्यतीत की थीवह स्थान 'तुलसी चौरानाम से विख्यात हुआ। वहाँ पर तुलसीदास जी की पीठ'बड़छता मठके रूप में प्रतिष्ठित है।


जय जगन्नाथ जी 🙏


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