घर का भोजन




एक स्त्री के पास एक बड़ा सा घर थाबड़े-बड़े १२ कमरों वालावह स्त्री अकेली रहती थीतो उसने सोचा क्यों  वह उसमें नवयुवकोंको पेइंग गेस्ट के रूप में रख लूंआमदनी भी होगी एवं मेरा अकेलापन भी दूर हो जाएगा.

उसने हर कमरे में दो-दो पलंग बिछवा कर शेष सारी सुविधाएं जुटा


लीं.

उसे भोजन बनाने और खिलाने का भी बहुत शौक थासुबह सब को नाश्ता करवाती और दोपहर के लिए भी पैकेट बना कर देती.

रात को तो खैर सबको गर्मागर्म भोजन मिलता ही था.

और वह स्त्री यह सब पूरा महीना बिना कोई छुट्टी लिए प्रेम पूर्वक करती थी.

छह माह बीत गएएक दिन उसकी बहुत पुरानी सखी उससे


मिलने आई.

बातचीत में उस स्त्री ने अपनी सहेली को बताया कि वह अब महीने में केवल २८ दिन ही भोजन बनाती हैबाकी के दो या तीन दिन सबको अपने भोजन की व्यवस्था स्वयं करनी होती है.

सहेली को कुछ आश्चर्य हुआ और उसने पूछा, “ऐसा क्योंपहले तो तुम इन्हें पूरा महीना प्यार से भोजन करवाती थी."


स्त्री ने कहा, “मैं पैसे भी अब २८ दिन के ही लेती हूं.”

पर यह लोग तो तुम्हें पूरे महीने के देने को तैयार है अब यह बेचारे युवक दो दिन क्या खाते होंगे?”

बात पैसों की नहीं है.”

तो फिर?”

मैं पूरे मन से खाना बनाती थी और खिलाती भी प्यार से थीपरन्तु मुझे हर समय शिकायतें ही



सुनने को मिलतीहर दिन कोई  कोई कमी निकाल ही लेतेकभी "नमक कम हैऔर कभी "रोटी ठंडी है” कह कर मुझे सुनाते.परन्तुजब से उन्हें दो दिन भोजन ढंग का नहीं मिलता और बाहर पैसे भी अधिक देने पड़ते हैं।

अब उन्हें मेरे बनाए भोजन की कदर रहती है और बिना बात की नुक्ताचीनी भी नही करते।


ये हम सबकी कहानी है। जो आसानी से उपलब्ध हैउसमे कमी निकालनाउसकी बेकद्री करना आदत बन गई है हम सबकी और जबउसी चीज की कमी हो जाए तो जैसा  भी है मजबूरन काम निकालना पड़ता है 


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